Sanjay Roy-Certified VK Teacher
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रोहिणी जी, आपने तो आध्यात्म की चरम इच्छा व्यक्त कर दी है।

यद्यपि पुनीत जी ने बहुत सुंदर प्रकार से आपको समझाने का प्रयास किया है, तथापि मै अपना मत देना चाहता हूँ। "निर्विचार " (thoughtless) की इच्छा होने से पहले, यह जानना आवश्यक है, कि यह स्थिति है क्या। मेरा अनुमान है कि आप गृहस्त हैं, परन्तु एक निर्विचार प्राणी इस दुनिया का नहीं हो सकता – क्यों ? क्योंकि यदि कोई प्राणी विचार-रहित है, तो संभवतः वह जीवित नहीं है। हमारे पूर्वज, ज्ञानी संत ऋषि-मुनि, जिस समय निर्वाण को प्राप्त हुए, उस समय भी वे निर्विचार नहीं थे – उनके मन में मोक्ष की इच्छा या विचार तो रहा ही होगा न ? फिर निर्विचार हो कर आप कैसे रह सकती हैं ?

मस्तिष्क है तो विचार भी होंगे – यही विधान है। जैसा कि पुनीत जी ने बताया, हमारे शरीर के विभिन्न कार्य, मस्तिष्क के तरंगादेश से ही संपन्न होते हैं। इनमे सबसे अनिवार्य विचार, साँस लेना, इन्द्रियों का कार्य, दृष्टि, घ्राण शक्ति, स्पर्श आदि हैं। इसीलिए निर्विचार प्राणी संभवतः जीवित नहीं माना जा सकता। आशा करता हूँ , आप मेरा आशय समझ रही होंगी। रही बात आपकी इच्छा की, तो मेरे विचार से आप शरत सर का सबसे विख्यात – "मौन साधना" का अभ्यास करें। VK को हाथों में ले कर उससे शरत सर की मौन साधना की ऊर्जा का अनुरोध करें और आनंद लें निर्विचार स्थिति का। इस अवस्था में वीके, आपके अनिवार्य तरंगो को कार्यान्वित रख कर, आपके भौतिक विचारों को शुन्य कर देगा – यही तो चाहती हैं न आप ?